Wednesday, June 12, 2013

" इश्वर कहाँ रहता है, किधर देखता है और क्या करता है"

                 किसी गांव में  एक गरीब ब्राहमण रहता था| वह लोगों के घरों में पूजा पाठ कर के अपनी जीविका चलाता  था| एक दिन एक राजा ने इस ब्राहमण को पूजा के लिए बुलवाया| ब्राहमण ख़ुशी ख़ुशी राजा के यहाँ चला गया | पूजा पाठ करके जब ब्राहमण अपने घर को आने लगा तो राजा ने ब्राहमण से पूछा "इश्वर कहाँ रहता है, किधर देखता है और क्या करता है"? ब्राहमण कुछ सोचने लग गया और फिर राजा से कहा, महाराज मुझे कुछ समय चाहिए इस सवाल का उत्तर देने के लिए| राजा ने कहा ठीक है, एक महीने का समय दिया| एक महीने बाद आकर  इस सवाल का उत्तर दे जाना | ब्राहमण इसका उत्तर सोचता रहा और घर की ओर चलता रहा परन्तु उसके कुछ समझ नहीं आरहा था| समय बीतने के साथ साथ ब्राहमण की चिंता भी बढ़ने लगी और  ब्राहमण उदास रहने लगा| ब्रह्मण का एक बेटा था जो काफी होशियार था उसने अपने पिता से उदासी का कारण  पूछा | ब्राहमण ने बेटे को बताया कि राजा ने उस से एक सवाल का जवाब माँगा है कि इश्वर  कहाँ रहता है;किधर देखता है,ओर क्या करता है ? मुझे कुछ सूझ नहीं रहा है| बेटे ने कहा पिताजी आप मुझे राजा के पास ले चलना  उनके सवालों का जवाब मै दूंगा|
                 ठीक एक महीने बाद ब्राह्मण  अपने बेटे को साथ लेकर राजा के पास गया और कहा कि आप के सवालों के जवाब मेरा बेटा देगा| राजा  ने  ब्राहमण के बेटे से पूछा बताओ इश्वर कहाँ रहता है? ब्राहमण के बेटे ने कहा राजन ! पहले अतिथि का आदर सत्कार किया जाता है उसे कुछ खिलाया पिलाया जाता है, फिर उस से कुछ पूछा जाता है| आपने तो बिना आतिथ्य किए ही प्रश्न पूछना शुरू  कर दिया है| राजा इस बात पर कुछ लज्जित हुए और  अतिथि के लिए दूध लाने  का आदेश दिया| दूध का गिलास प्रस्तुत किया गया| ब्राहमण बेटे ने दूध का गिलास हाथ मै पकड़ा  और  दूध में  अंगुल डाल कर घुमा कर बार बार दूध से बहार निकाल  कर देखने लगा| राजा ने पूछा ये क्या कर रहे हो  ? ब्राहमण पुत्र बोला सुना है दूध में  मक्खन  होता है| मै वही देख रहा हूँ कि दूध में  मक्खन  कहाँ है? राजा ने कहा दूध मै मक्खन  होता है,परन्तु वह ऐसे  दिखाई नहीं देता| दूध को जमाकर दही बनाया जाता है  फिर उसको मथते है तब मक्खन  प्राप्त होता है| ब्राहमण बेटे ने कहा महाराज यही आपके सवाल का जवाब है| परमात्मा प्रत्येक  जीव के अन्दर बिद्यमान  है | उसे पाने के लिए नियमों का अनुष्ठान करना पड़ता है | मन से ध्यान द्वारा अभ्यास से आत्मा में  छुपे हुए परम देव पर आत्मा के निवास का आभास होता है| जवाब सुन कर राजा खुश  हुआ ओर कहा अब मेरे दूसरे सवाल का जवाब दो|
              "इश्वर किधर देखता है"? ब्राहमण के बेटे ने तुरंत एक मोमबत्ती मगाई और उसे जला कर राजा से बोला महाराज यह मोमबत्ती किधर रोशनी करती है? राजा ने कहा इस कि रोशनी चारो  तरफ है| तो ब्राहमण  के बेटे ने कहा यह ही आप के दूसरे सवाल का जवाब है| परमात्मा सर्वदृष्टा  है और  सभी प्राणियों के कर्मों को देखता है| राजा ने खुश होते हुए कहा कि अब मेरे अंतिम सवाल का जवाब दो  कि"परमात्मा क्या करता है"? ब्राहमण के बेटे ने पूछा राजन यह बताइए कि आप इन सवालों को गुरु बन कर पूछ रहे हैं या शिष्य बन कर? राजा विनम्र हो कर बोले मै शिष्य बनकर पूछ रहा हूँ| ब्राहमण बेटे ने  कहा वाह महाराज!आप बहुत अच्छे शिष्य हैं| गुरु तो नीचे  जमीन पर खड़ा  है और  शिष्य सिहासन पर विराजमान है| धन्य है महाराज आप को और आप के शिष्टचार को | यह सुन कर राजा लज्जित हुए वे अपने सिहासन से नीचे उतरे और ब्राहमण बेटे को सिंहासन पर बैठा कर पूछा अब बताइए  इश्वर क्या करता है? ब्राहमण बेटे ने कहा अब क्या बतलाना रह गया है| इश्वर यही करता है कि राजा को रंक और रंक को राजा बना देता है| राजा उस के जवाब सुन कर काफी प्रभावित हुआ और ब्राहमण बेटे को  अपने दरबार में  रख लिया|
             इस प्रकार परमात्मा प्रत्येक जीव के ह्रदय में  आत्मा रूप से विद्यमान रहता है| परमात्मा  के साथ प्रेम होने पर सभी प्रकार के सुख एश्वर्य की प्राप्ति होती है परमात्मा के बिमुख जाने पर दुर्गति होती है|

Thursday, May 9, 2013

जो तुम ने करी सो हमने जानी


  बहुत पुराने समय की  बात है एक गांव  मे अमर नाम का एक गरीब ब्राहमण रहता था| इधर उधर से मांग कर अपना और अपने परिवार का गुजारा  बड़ी  मुश्किल  से चलाता  था|वहीँ पास के गांव मे एक नामी  सेठ घनश्याम दास भी रहता था| सेठ घनश्याम दास की  कोई औलाद नहीं थी| सेठ जगह जगह अपनी औलाद के लिए प्रार्थना करता और धरम करम के काम भी करवाता रहता था आखिर भगवान्  ने उस की सुन ली | सेठ घनश्याम दास के घर एक सुन्दर सा बेटा पैदा हुआ| सेठ घनश्याम दास ने पुत्र रतन पाने पर भगवान्  का शुक्रिया  अदा किया और इस ख़ुशी मे एक दावत का आयोजन किया जिस मे आस पास के सभी ब्राहमणों को बुलावा भेजा| यह बात गरीब ब्राहमण अमर के कानों मे भी पड  गयी| दावत मे ३६ प्रकार के भोजन होंगे यह सोचते ही अमर के मुंह मे पानी आ गया| और उस ने भी दावत मे शामिल होने की सोची लेकिन अगले ही पल उदास हो गया क्योँ कि खाना खाने के बाद टीका लगते समय कोई मंत्र या श्लोक बोलना होता था| जो बेचारे गरीब अमर को नहीं आता था| अमर ने फिर भी हिम्मत नहीं हांरी  सोचा कम से कम भर पेट खाना तो मिलेगा ही आगे जो होगा देखा जाएगा भगवान् भली करेंगे? अमर साफ सुथरे कपडे  पहन कर कंधे मै अंगोछा लटकाए सेठ घनश्याम दास के घर की तरफ चल दिया| वहां जा कर क्या कहूँगा यह सोचते सोचते वह एक तालाब के नजदीक से गुजरा| तालाब के नजदीक से गुजरते समय उसने देखा कि कुछ मेढक तालाब के किनारे धूप  सेक रहे थे| अमर के तालाब  के नजदीक जाते ही मेढ़को  ने पानी मे छलाग लगा दी| मेढ़को के पानी मे छलाग लगाते  ही पानी की बूंदें इधर उधर बिखर गयीं और तालाब के पानी मे लहरें हिलने लगीं | इस दृश्य को देख कर अमर के मनमे एक ख्याल आया और उस के मुंह से निकल पढ़ा" छिटपित छिटपित उप्पर छटकायो पानी, जो तुम ने करी सो हमने जानी"| अमर का चेहरा खिल उठा उसने सोचा कि टीका लगाते समय के लिए यह श्लोक ही ठीक रहेगा| वह इस श्लोक को याद करता हुआ सेठ घनश्याम दास के घर पहुँच गया| यहाँ उसने देखा कि बहुत बड़े  बड़े  विद्वान पहुंचे हुए हैं और काफी चहल पहल है| अमर भी एक तरफ हो कर बैठ गया| कुछ समय बाद खाने का बुलावा आया सभी लोग खाने को बैठ गए अमर भी बैठ गया| खूब डट कर खाया  आनंद आ गया |
                   खाना खाने के बाद अब बारी  आई टीका लगाने की तो अमर ने देखा की यहाँ तो ब्राहमण एक से बढ़ कर एक श्लोक या मंत्र बोल रहे थे अमर का दिल घबराया, पर अब क्या हो सकता था जब आ ही गया था| अमर ने हिम्मत से काम  लिया और जब उसकी बारी आई तो उसने डरते हुए धीरे से मंत्र बोल दिया जो उसे तालाब के किनारे सुझा था| घबराहट मै उसकी आवाज साफ नहीं सुन रही थी| सेठ घनश्याम दास ने मंत्र दुबारा कहने को कहा तो अमर ने डरते हुए जोर से बोल दिया "छिटपित छिटपित उप्पर छटकायो पानी, जो तुम ने करी सो हमने जानी"| सेठ को ये शब्द अच्छे  लगे और उसने इन्हे एक तख्ती मै लिख कर लटका दिया| ब्राहमण अमर को काफी सारा धन दे कर विदा कर दिया| अमर धन पाकर बहुत खुश हो गया और सेठ को आशीर्वाद दे कर ख़ुशी ख़ुशी अपने घर को चला गया| 
                    सेठ घनश्याम दास की अपने पडोसी  सेठ जीवन दास से पुरानी  दुश्मनी थी| घनश्याम दास के ज्यादा पैसे वाला  होने की वजह से जीवन दास उस का कुछ भी बिगाड़  नहीं सकता था| घनश्यामदास और जीवन दास का नाई एक ही था | जीवनदास ने उस नाई को लालच दे कर कहा कि तुम मेरा एक काम  कर सकते हो,अगर तुम मेरा काम कर दो तो मै तुम्हें मुह माँगा इनाम दुगा? इस पर नाई ने पूछा क्या काम  है? मै कर दुगा| जीवनदास ने बताया कि जब तुम घनश्यामदास की शेव करोगे तो वह गले के बाल  काटने के लिए अपनी गर्दन ऊपर करेगा तो उस्तरे से उस का गला चीर  देना| पैसे के लालच मे आ कर नाई ऐसा करने को तैयार  हो गया| अगले दिन जब नाई घनश्यामदास के घर शेव करने गया तो शेव करते समय जब घनश्यामदास ने गला ऊपर किया तो उसकी नजर अमर की लिखी तख्ती पर पढ़ गई और वह  बोल उठा "छिटपित छिटपित ऊपर छटकायो  पानी,जो तुम ने करी सो हमने जानी"| नाई के हाथ से उस्तरा नीचे गिर गया और सेठ घनश्यामदास से मांफी मागने लगा| घनश्याम दास के पूछने पर नाई ने सारी   हकीकत बता दी कि किस तरह जीवनदास उसकी हत्या करवाना चाहता था| उसने नाई को माफ़ कर दिया और आगे से शेव करने घर आने को मना कर दिया| सेठ घनश्यामदास ने भगवान् को धन्यवाद किया और फिर उस गरीब अमर को याद किया जिस की वजह से उस की जान बच गई | सेठ घनश्यामदास ने तुरंत अपना आदमी भेज कर अमर को बुलवाया| अमर बेचारा डर गया पता नहीं सेठ ने क्यों बुलाया है? जब बुलावा आया ही था तो जाना ही था | अमर सेठ घनश्यामदास के घर गया और  हाथ जोड़ कर खड़ा  हो गया | सेठ घनश्यामदास ने उस की अच्छी तरह से खातिरदारी  की और बताया की किस तरह आज अमर के कहे शब्दों  ने घनश्यामदास की जान बचाई| सेठ घनश्यामदास ने अमर को खूब सारा धन दिया और उसका  धन्यवाद किया| अमर ने  सेठ घनश्याम दास को आशीर्वाद दिया और अपने घर आ कर आराम से अपनी जिन्दगी बसर करने लगा|                                  के. आर. जोशी (पाटली)


Saturday, January 5, 2013

कर्म ही कर्तव्य है


              मानव-जीवन पाकर भी, भगवत्प्राप्ति का उद्देश्य समझकर भी मनुष्य दिग्भ्रमित क्यों रहता है? क्या जीवन उसे उसकी इच्छा से प्राप्त हुआ है? अमुक वंश या अमुक जाति में जन्म पाना मनुष्य के बस की बात नहीं है| फिर क्यों न मनुष्य जहाँ प्रभु की इच्छासे जीवन जीने का स्थान मिला, उसे ही अपनी कर्मभूमि समझ अपने योग्यतानुसार प्रभु कार्य में लगाकर अपना जीवन सफल करने का प्रयास करे|
                मनुष्य को जो कुछ भगवान ने दिया है उसके प्रति आभार ब्यक्त करने की अपेक्षा जो नहीं मिला उसे लेकर वह चिंतित तथा दु:खी रहता है|  भौतिक सुख-साधनों को सर्वोपरि  समझ कर परमार्थ को भूल जाता है| अपने जिम्मे आये कार्यों  को करना नहीं चाहता| केवल भोग भोगना चाहता है, कितनी बड़ी मूर्खता  करता है|
                एक किसान हल चलाता  और खेत की मिटटी को नरम कर उसमें बीज  डालता है| उसके पश्चात् प्राकृत या परमात्मा के अनुग्रह से फसल होती है तथा फल भी प्राप्त होता है| यदि भाग्य में नहीं होता तो वर्षा न होने या कम होने से लाभसे वंचित भी रह जाता है| मगर यदि मेहनत नहीं करेगा, बीज  नहीं बोएगा तो  कितनी ही अच्छी वर्षा से फल लाभ     दायक नहीं हो सकता | ईश्वर की सहायता भी तभी फली भूत होती है जब हम ने अपना कार्य किया हो| केवल आशावादी बनकर कर्म-विमुख जीवन निरर्थक है| बिना बीज बोए तो अनपेक्षित झाड़-झंखाड़ ही पैदा होंगे और शेष जीवन उन झाड़ियों के उखाड़ फेंकने में ही बीत जाएगा| 

Monday, December 31, 2012

नए साल 2013 की हार्दिक शुभकामनाएँ|

                  नया  साल 2013 आप लोगों के लिए खुशियों भरा हो मंगलमय हो भगवान आप सब की मनोकामना पूर्ण करे और आप सब नए साल 2013 में दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्की  करें| यह मेरी आप सब के लिए हार्दिक शुभकामना है| नए साल के आगमन पर आइए हम संकल्प करें कि हम इस देश के सच्चे नागरिक बनें| अंत में आप सब को नए साल 2013 की हार्दिक शुभकामनाएँ|

Thursday, June 14, 2012

सियार और बन्दर

             प्राचीन काल बात है, दो ब्यक्ति आपस में बहुत अच्छे मित्र थे, पर दूसरे जन्म में उनमें से एक को सियार की योनि मिली और दूसरा  बन्दर बना।
            सियार जो था, वह शमशान में रहा करता थाऔर मुर्दों का भोजन किया करता था। वहीँ एक वृक्ष था, उसपर एक बन्दर भी रहा करता था। विशेष बात यह थी कि दोनों को अपने पूर्वजन्म की साडी बातें याद थीं।
           एक दिन वृक्ष पर बैठे बन्दर ने सियार से जिज्ञासावश पूछा-सियार भाई! तुम पूर्वजन्म में कौन थे और तुम ने कौन सा ऐसा निंदनीय कार्य किया था, जिस से तुम्हें सियार की पशु-योनि प्राप्त हुई है और ऐसे घृणित एवं दुर्गन्धयुक्त मुर्दे से अपना पेट भरना पड़ रहा है। इसपर सियार ने दुखी होते हुए कहा-
            भाई वानर! क्या बताऊँ। पूर्वजन्म मैं मनुष्य-योनि में था और मैंने एक ब्रह्मण देवता को एक वस्तु देने की प्रतिज्ञा कर के फिर उन्हें वह वस्तु दी नहीं थी, इसी प्रतिज्ञा-भंग के दोष से मुझे यह दुखित पापयोनि प्राप्त हुई है। आब तो अपने कर्मका भोग भोगना ही है। मेरी तो बात हो गई, आब तुम बताओ कि तुमने कौन सा पाप किया था?
            इस पर वानर बोला-सियार भाई! में भी पहले मनुष्य ही था। किन्तु मेरा यह स्वभाव था कि में सदा ब्राहमणों के फल चुराकर ख्य करता था। इसी पापकर्म से मुझे यह वानर-योनि प्राप्त हुई है। इस लिए किसी की भी आशाको भंग नहीं करना चाहिए। संकल्प किया गया दान अवश्य ही देना चाहिए अन्यथा दुसरे जन्म में महां कष्ट उठाना पड़ता है।     

Thursday, May 31, 2012

अन्धकासुर

                   बहुत समय पहले की बात है| हिरण्याक्ष का एक बेटा था, जिसका नाम अन्धक था| अन्धक ने तपस्या के द्वारा ब्रह्मा जी की कृपा से न मारे जाने का वर प्राप्त कर के त्रिलोकी का उपभोग करते हुए इन्द्रलोक को जीत लिया और वह इन्द्र को पीड़ित करने लगा| देवतागण उस से डर कर मंदरपर्वत की गुफा में प्रविष्ट हो गए| महादैत्य अन्धक भी देवताओं को पीड़ित करता हुआ गुफा वाले मंदरपर्वत पर पहुँच गया| सभी देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना  की| यह सब वृतांत सुन कर भगवान शिव अपने गणेश्वरों  के साथ अन्धक के समक्ष पहुँच गए तथा उन्हों ने उसके समस्त राक्षसों को भस्म कर के अन्धक को अपने त्रिशूल से बींध डाला| यह देख कर ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवगण हर्षध्वनि करने लगे| त्रिशूल से बिंधे हुए उस अन्धक के मन में सात्विक भाव जागृत हो गए| वह सोचने लगा- शिव की कृपा से मुझे यह गति प्राप्त हुई है| अपने पुण्य-गौरव के कारण वह अन्धक उसी स्थिति में भगवान शिव की स्तुति करने लगा| उसकी स्तुति से प्रसन्न हो कर भगवान शंकर दयापूर्वक उसकी ओर देखते हुए बोले- हे अन्धक! वर मांगो, तुम क्या चाहते हो? अन्धक ने गदगद बाणी में महेश्वर से कहा- हे भगवन! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे यही वर प्रदान करें की आप में मेरी सदा भक्ति हो|
                अन्धक का वचन सुन कर शिव ने उस दैत्येन्द्र को अपनी दुर्लभ भक्ति प्रदान की और त्रिशूल से उतार कर उसे गणाधिपद प्रदान किया|

Saturday, May 12, 2012

ऋषि शंख और लिखित

                          ऋषि शंख और लिखित दो भाई थे| दोनों धर्मशास्त्रके परम मर्मग्य थे| विद्या अध्ययन समाप्त कर के दोनों ने विवाह किया और अपने अपने आश्रम अलग अलग बना कर रहने लगे|
                            एक बार ऋषि लिखित अपने बड़े भाई शंख के आश्रम पर उनसे मिलने गए| आश्रम पर उस समय कोई भी नहीं था| लिखित को भूख लगी थी| उन्हों ने बड़े भाई के बगीचे से एक फल तोडा और खाने लगे| वे फल पूरा खा भी नहीं सके थे, इतने में शंख आगये| लिखित ने उनको प्रणाम किया|
                             ऋषि शंख ने छोटे भाई को सत्कार पूर्वक समीप बुलाया| उनका कुशल समाचार पूछा| इसके पश्चात् बोले-- भाई तुम यहाँ आये और मेरी अनुपस्थिति में इस बगीचे को अपना मानकर तुमने यहाँ से फल लेलिया, इस से मुझे प्रशन्नता हुई;किन्तु हम ब्राह्मणों का सर्वस्व धर्म ही है, तुम धर्म का तत्व जानते हो| यदि किसी की वस्तु  उसकी अनुपस्तिथि में उसकी अनुमति के बिना ले ली जाए तो इस कर्म की क्या संज्ञा होगी? "चोरी!" लिखित ने बिना हिचके जवाब दिया| मुझ से प्रमादवस यह अपकर्म होगया है| अब क्या करना उचित है?
                           शंख ने कहा! राजा से इसका दंड ले आओ| इस से इस दोष का निवारण हो जायेगा| ऋषि लिखित राजधानी गए| राजाने उनको प्रणाम कर के अर्घ्य देना चाहा तो ऋषि ने उनको रोकते हुए कहा-राजन! इस समय में आपका पूजनीय नहीं हूँ| मैंने अपराध किया है, आपके लिए मैं दंडनीय हूँ|
                           
                          अपराध का वर्णन सुन कर राजाने कहा- नरेश को जैसा दंड देने का अधिकार है, वैसे ही क्षमा करने का भी अधिकार है| लिखित ने रोका- आप का काम अपराध के दंड का निर्णय करना नहीं है,विधान निश्चित करना तो ब्रह्मण का काम है| आप विधान को केवल क्रियान्वित कर सकते हैं| आप को मुझे दंड देना है, आप दंड विधान का पालन करें|
                          उस समय दंड  विधान के अनुसार चोरी का दंड था- चोर के दोनों हाथ काट देना| राजा ने लिखत के दोनों हाथ कलाई तक कटवा दिए| कटे हाथ ले कर लिखित प्रशन्न हो बड़े भाई के पास लौटे और बोले- भैया! मैं दंड ले आया|


                         शंख ने कहा- मध्यान्ह-स्नान-संध्या का समय हो गया है| चलो स्नान संध्या कर आयें| लिखित ने भाई के साथ नदी में स्नान किया| अभ्यासवश तर्पण करने के लिए उनके हाथ जैसे ही उठे तो अकस्मात् वे पूर्ण हो गए| उन्हों ने बड़े भाई की तरफ देख कर कहा- भैया! जब यह ही करना था तो आप ने मुझे राजधानी तक क्यूँ दौड़ाया? शंख बोले - अपराध का दंड तो शासक ही दे सकता है; किन्तु ब्रह्मण को कृपा करने का अधिकार है|