Thursday, July 31, 2014

काबिलियत

                       किसी जंगल में एक बहुत बड़ा तालाब था . तालाब के पास एक बागीचा था , जिसमे अनेक प्रकार के पेड़ पौधे लगे थे . दूर- दूर से लोग वहाँ आते और बागीचे की तारीफ करते .
गुलाब के पेड़ पे लगा पत्ता हर रोज लोगों को आते-जाते और फूलों की तारीफ करते देखता, उसे लगता की हो सकता है एक दिन कोई उसकी भी तारीफ करे. पर जब काफी दिन बीत जाने के बाद भी किसी ने उसकी तारीफ नहीं की तो वो काफी हीन महसूस करने लगा . उसके अन्दर तरह-तरह के विचार आने लगे—” सभी लोग गुलाब और अन्य फूलों की तारीफ करते नहीं थकते पर मुझे कोई देखता तक नहीं , शायद मेरा जीवन किसी काम का नहीं, कहाँ ये खूबसूरत फूल और कहाँ मैं,” और ऐसे विचार सोच कर वो पत्ता काफी उदास रहने लगा.
                     दिन यूँही बीत रहे थे कि एक दिन जंगल में बड़ी जोर-जोर से हवा चलने लगी और देखते-देखते उसने आंधी का रूप ले लिया. बागीचे के पेड़-पौधे तहस-नहस होने लगे , देखते-देखते सभी फूल ज़मीन पर गिर कर निढाल हो गए , पत्ता भी अपनी शाखा से अलग हो गया और उड़ते-उड़ते तालाब में जा गिरा.
पत्ते ने देखा कि उससे कुछ ही दूर पर कहीं से एक चींटी हवा के झोंको की वजह से तालाब में आ गिरी थी और अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रही थी.
                   चींटी प्रयास करते-करते काफी थक चुकी थी और उसे अपनी मृत्यु तय लग रही थी कि तभी पत्ते ने उसे आवाज़ दी, ” घबराओ नहीं, आओ , मैं तुम्हारी मदद कर देता हूँ .”, और ऐसा कहते हुए अपनी उपर बैठा लिया. आंधी रुकते-रुकते पत्ता तालाब के एक छोर पर पहुँच गया; चींटी किनारे पर पहुँच कर बहुत खुश हो गयी और बोली, ” आपने आज मेरी जान बचा कर बहुत बड़ा उपकार किया है , सचमुच आप महान हैं, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ! “
                  यह सुनकर पत्ता भावुक हो गया और बोला,” धन्यवाद तो मुझे करना चाहिए, क्योंकि तुम्हारी वजह से आज पहली बार मेरा सामना मेरी काबिलियत से हुआ , जिससे मैं आज तक अनजान था. आज पहली बार मैंने अपने जीवन के मकसद और अपनी ताकत को पहचान पाया हूँ |
                 मित्रों , ईश्वर ने हम सभी को अनोखी शक्तियां दी हैं ; कई बार हम खुद अपनी काबिलियत से अनजान होते हैं और समय आने पर हमें इसका पता चलता है, हमें इस बात को समझना चाहिए कि किसी एक काम में असफल होने का मतलब हमेशा के लिए अयोग्य होना नही है . खुद की काबिलियत को पहचान कर आप वह काम कर सकते हैं , जो आज तक किसी ने नही किया है !

Saturday, July 19, 2014

मनुष्य की कीमत

                एक बार लोहे की दुकान में अपने पिता के साथ काम कर रहे एक बालक ने अचानक ही अपने पिता से पुछा – “पिताजी इस दुनिया में मनुष्य की क्या कीमत होती है ?”
पिताजी एक छोटे से बच्चे से ऐसा गंभीर सवाल सुन कर हैरान रह गये.
फिर वे बोले “बेटे एक मनुष्य की कीमत आंकना बहुत मुश्किल है, वो तो अनमोल है.”
बालक – क्या सभी उतना ही कीमती और महत्त्वपूर्ण हैं ?
पिताजी – हाँ बेटे.
              बालक कुछ समझा नही उसने फिर सवाल किया – तो फिर इस दुनिया मे कोई गरीब तो कोई अमीर क्यो है? किसी की कम रिस्पेक्ट तो कीसी की ज्यादा क्यो होती है?
सवाल सुनकर पिताजी कुछ देर तक शांत रहे और फिर बालक से स्टोर रूम में पड़ा एक लोहे का रॉड लाने को कहा.
रॉड लाते ही पिताजी ने पुछा – इसकी क्या कीमत होगी?
बालक – 200 रूपये.
पिताजी – अगर मै इसके बहुत से छोटे-छटे कील बना दू तो इसकी क्या कीमत हो जायेगी ?
बालक कुछ देर सोच कर बोला – तब तो ये और महंगा बिकेगा लगभग 1000 रूपये का .
पिताजी – अगर मै इस लोहे से घड़ी के बहुत सारे स्प्रिंग बना दूँ तो?
बालक कुछ देर गणना करता रहा और फिर एकदम से उत्साहित होकर बोला ” तब तो इसकी कीमत बहुत ज्यादा हो जायेगी.”
               फिर पिताजी उसे समझाते हुए बोले – “ठीक इसी तरह मनुष्य की कीमत इसमे नही है की अभी वो क्या है, बल्की इसमे है कि वो अपने आप को क्या बना सकता है.”
बालक अपने पिता की बात समझ चुका था .
            दोस्तो  अक्सर हम अपनी सही कीमत आंकने मे गलती कर देते है. हम अपनी ताजी हालत को देख कर अपने आप को बेकार समझने लगते है. लेकिन हममें हमेशा अथाह शक्ति होती है. हमारा जीवन हमेशा सम्भावनाओ से भरा होता है. हमारी जीवन मे कई बार स्थितियाँ अच्छी नही होती है पर इससे हमारी कीमत  कम नही होती है. मनुष्य के रूप में हमारा जन्म इस दुनिया मे हुआ है इसका मतलब है हम बहुत  खास  हैं . हमें हमेशा अपने आप  में सुधार करते रहना चाहिये और अपनी सही कीमत प्राप्त करने की दिशा में बढ़ते रहना चाहिये.

Thursday, May 22, 2014

खुशी संसार मेँ नहीँ !

                   एक बार की बात है कि एक शहर में बहुत अमीर सेठ रहता था| अत्यधिक धनी होने पर भी वह हमेशा दुःखी ही रहता था| एक दिन ज़्यादा परेशान होकर वह एक ऋषि के पास गया और उसने अपनी सारी समस्या ऋषि को बताई | उन्होने सेठ की हुई बात ध्यान से सुनी और सेठ से कहा कि कल तुम इसी वक्त फिर से मेरे पास आना , मैं कल ही तुम्हें तुम्हारी सारी समस्याओं का हल बता दूँगा |
               सेठ खुशी खुशी घर गया और अगले दिन जब फिर से ऋषि के पास आया तो उसने देखा कि ऋषि सड़क पर कुछ ढूँढने में व्यस्त थे| सेठ ने गुरु जी से पूछा कि महर्षि आप क्या ढूँढ रहे हैं , गुरुजी बोले कि मेरी एक अंगूठी गिर गयी है मैं वही ढूँढ रहा हूँ पर काफ़ी देर हो गयी है लेकिन अंगूठी मिल ही नहीं रही है|
              यह सुनकर वह सेठ भी अंगूठी ढूँढने में लग गया, जब काफ़ी देर हो गयी तो सेठ ने फिर गुरु जी से पूछा कि आपकी अंगूठी कहाँ गिरी थी| ऋषि ने जवाब दिया कि अंगूठी मेरे आश्रम में गिरी थी पर वहाँ काफ़ी अंधेरा है इसीलिए मैं यहाँ सड़क पर ढूँढ रहा हूँ| सेठ ने चौंकते हुए पूछा कि जब आपकी अंगूठी आश्रम में गिरी है तो यहाँ क्यूँ ढूँढ रहे हैं| ऋषि ने मुस्कुराते हुए कहा कि यही तुम्हारे कल के प्रश्न का उत्तर है, खुशी तो मन में छुपी है लेकिन तुम उसे धन में खोजने की कोशिश कर रहे हो| इसीलिए तुम दुःखी हो, यह सुनकर सेठ ऋषि के पैरों में गिर गया|
              तो मित्रों, यही बात हम लोगों पर भी लागू होती है जीवन भर पैसा इकट्ठा करने के बाद भी इंसान खुश नहीं रहता क्यूंकि हम पैसा कमाने में इतना मगन हो जाते हैं और अपनी खुशी आदि सब कुछ भूल जाते हैं |"

Wednesday, April 2, 2014

माँ बाप


                उन सब चीजो से अनजान वो अपने माता पिता की सेवा करता रहा| एक दिन उसकी माँ बाप की सेवा भक्ति से खुश होकर भगवान धरती पे आ गए| उस वक्त वो बालक अपनी माँ के पाँव दबा रहा था, भगवान दरवाजे के बाहर से बोले, दरवाजा खोलो बेटा, मैं तुम्हारी माता पिता की सेवा से प्रसन्न होकर वरदान देने आया हूँ| लड़के ने कहा-इंतजार करो प्रभु, मैं माँ की सेवा मे लगा हूँ|
               भगवान बोले-देखो मैं वापस चला जाऊँगा, बालक- आप जा सकते है भगवान, मैं सेवा बीच मे नही छोड़ सकता| कुछ देर बाद उसने दरवाजा खोला, भगवान बाहर खड़े थे| बोले- लोग मुझे पाने के लिए कठोर तपस्या करते है, मैं तुम्हे सहज मे मिल गया और तुमने मुझसे प्रतीक्षा करवाई लड़के का जवाब था- 'हे ईश्वर, जिस माँ बाप की सेवा ने आपको मेरे पास आने को मजबूर कर दिया, उन माँ बाप की सेवा बीच मे छोड़कर मैं, दरवाजा खोलने कैसे आता|
             और यही इस जिंदगी का सार है, जिंदगी मे हमारे माँ बाप से बढ़कर कुछ नही है. हमारे माँ बाप ही हमे ये जिंदगी देते  एक बालक ने अपने माँ बाप की खूब सेवा की.दोस्त उससे कहते कि अगर इतनी सेवातुमने भगवान की की होती, तो तुम्हे भगवान मिल जाते|
                 लेकिन  है. यही माँ बाप अपना पेट काटकर बच्चो के लिए अपना भविष्य खराब कर देते है. इसके बदले हमारा भी ये फर्ज बनता है कि हम कभी उन्हे दुःख ना दे. उनकी आँखो मे आँसू कभी ना आए, चाहे परिस्थिति जो भी हो.

Tuesday, February 25, 2014

शुभचिंतक

            एक राजा बड़ा सरल का था। उसके प्रशंसक और भक्त बनकर अनेकों लोग राजदरबार में पहुँचते और कुछ ठग कर ले जाते। एक से दूसरे को खबर लगी। चर्चा फैली। कुछ न कुछ लाभ उठाने की इच्छा से अगणित लोग राजा के प्रशंसक और शुभचिंतक बनकर दरबार में पहुँचने लगे।
            इस बढ़ती भीड़ को देखकर राजा स्वयं हैरान रहने लगा। एक दिन राजा ने विचारा कि इतने लोग सच्चे शुभचिंतक नहीं हो सकते। इनमें से असली और नकली की परख करनी चाहिए। राजा ने पुरोहित से परामर्श करके दूसरे दिन बीमार बनने का बहाना बना लिया और घोषणा करा दी कि पाँच व्यक्तियों का रक्त मिलने से रोग की चिकित्सा हो सकेगी। रोग ऐसा भयंकर है कि इसके अतिरिक्त और कोई इलाज नहीं। सो जो राजा के शुभचिंतक हों अपना प्राणदान देने के लिए उपस्थित हों।घोषणा सुनकर राज्य भर में हलचल मच गईं। एक से एक बढ़ कर अपने को शुभचिंतक बताने वालों में से एक भी दरबार में न पहुँचा।
           राजा और उसके पुरोहित दो ही बैठे हुए असली- नकली की परीक्षा के इस खेल पर विनोद करने लगे। पुरोहित ने कहा- राजन् हमारी ही तरह परमात्मा भी अपने सच्चे-झूठे भक्तों की परीक्षा लेता रहता है। परमात्मा का प्रयोजन पूरा करने वाले सच्चे भक्त संसार में नहीं के बराबर दीखते हैं, जब कि उससे कुछ याचना करने वाले स्वार्थियों की भीड़ सदा ही उसके दरबार में लगी रहती है।’’

Friday, January 17, 2014

कबीर जी और लोई

                     एक बार बारिश के मौसम में कुछ साधू-महात्मा अचानक कबीर जी के घर आ गये ! बारिश के कारण कबीर साहब जी बाज़ार में कपडा बेचने नही जा सके और घर पर खाना भी काफी नही था !उन्होंने अपनी पत्नी लोई से पूछा -क्या कोई दुकानदार कुछ आटा -दाल हमें उधार दे देगा जिसे हम बाद में कपडा बेचकर चुका देगे !पर एक गरीब जुलाहे को भला कौन उधार देता जिसकी कोई अपनी निश्चित आय भी नही थी ! लोई कुछ दुकानो पर सामान लेने गई पर सभी ने नकद पैसे मांगे आखिर एक दुकानदार ने उधार देने के लिये उनके सामने एक शर्त रखी कि अगर वह एक रात उसके साथ बितायेगी तो वह उधार दे सकता है !इस शर्त पर लोई को बहुत बुरा तो लगा लेकिन वह खामोश रही जितना आटा-दाल उन्हें चाहिये था दुकानदार ने दे दिया !
                  जल्दी से घर आकर लोई ने खाना बनाया और जो दुकानदार से बात हुई थी कबीर साहब को बता दी ! रात होने पर कबीर साहब ने लोई से कहा कि दुकानदार का क़र्ज़ चुकाने का समय आ गया है ; चिंता मत करना सब ठीक हो जायेगा !जब वह तैयार हो कर जाने लगी कबीर जी बोले क़ि बारिश हो रही है और गली कीचड़ से भरी है तुम कम्बल ओढ़ लो मै तुमे कंधे पर उठाकर ले चलता हूँ ! जब दोनों दुकानदार के घर पर पहुचे लोई अन्दर चली और कबीर जी दरवाजे के बाहर उनका इंतज़ार करने लगे !लोई को देखकर दुकानदार बहुत खुश हुआ पर जब उसने देखा कि बारिश बावजूद न तो लोई के कपडे भीगे है ओर ना ही पाँव तो उसे बहुत हैरानी हुई !उसने पूछा -यह क्या बात है क़ि कीचड़ से भरी गली में से तुम आई हो फि भी तुमारे पावो पर कीचड़ का एक दाग भी नही ! तब लोई ने जवाब दिया -इसमें हैरानी की कोई बात नही मेरे पति मुझे कम्बल ओढा कर अपने कंधे पर बिठाकर यहाँ पर लाये है !यह सुनकर दूकानदार बहुत चकित रह गया ;लोई का निर्मल और निष्पाप चेहरा देखकर वह बहुत प्रभावित हुआ और आश्चर्य से उसे देखता रहा !जब लोई ने कहा कि उसके पति कबीर साहब जी उसे वापस ले जाने के लिये बाहर इंतज़ार कर रहे है तो दुकानदार अपनी नीचता और कबीर साहब जी की महानता को देख-देख कर शर्म से पानी-पानी हो गया ! उसने लोई और कबीर साहब जी दोनों से घुटने टेक कर क्षमा मांगी !कबीर साहब जी ने उसको क्षमा कर दिया !
               दुकानदार कबीर जी के दिखाये हुए मार्ग पर चल पड़ा जो कि था परमार्थ का मार्ग और समय के साथ उनके प्रेमी भक्तो में गिना जाना लगा ;भटके हुए जीवो को सही रास्ते पर लाने के लिए संतो के अपने ही तरीके होते है ! संत ने छोड़े संतई चाहे कोटिक मिले असंत ; चन्दन विष व्यामत नही लिपटे रहत भुजंग ! पूर्ण संत हर काल में हर किसी की मनकी मैल और विकारो को मिटाकर एवं प्रभु का ज्ञान करवाकर प्रभु की कृपादर्ष्टि का पात्र बनाता है!

Thursday, October 10, 2013

देने का आनंद



                      
                 एक बार एक शिक्षक संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखने वाले एक युवा शिष्य के साथ कहीं टहलने निकले . उन्होंने देखा की रास्ते में पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं , जो संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे जो अब अपना काम ख़त्म कर घर वापस जाने की तयारी कर रहा था .शिष्य को मजाक सूझा उसने शिक्षक से कहा , “ गुरु जी क्यों न हम ये जूते कहीं छिपा कर झाड़ियों के पीछे छिप जाएं ; जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा !!”
                 शिक्षक गंभीरता से बोले , “ किसी गरीब के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है . क्यों ना हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छिप कर देखें की इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है !!”शिष्य ने ऐसा ही किया और दोनों पास की झाड़ियों में छुप गए .मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया . उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ , उसने जल्दी से जूते हाथ में लिए और देखा की अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे , उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें पलट -पलट कर देखने लगा . फिर उसने इधर -उधर देखने लगा , दूर -दूर तक कोई नज़र नहीं आया तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए . अब उसने दूसरा जूता उठाया , उसमे भी सिक्के पड़े थे …मजदूर भावविभोर हो गया , उसकी आँखों में आंसू आ गए , उसने हाथ जोड़ ऊपर देखते हुए कहा – “हे भगवान् , समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए उस अनजान सहायक का लाख -लाख धन्यवाद , उसकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दावा और भूखें बच्चों को रोटी मिल सकेगी .”
                 मजदूर की बातें सुन शिष्य की आँखें भर आयीं . शिक्षक ने शिष्य से कहा – “ क्या तुम्हारी मजाक वाली बात की अपेक्षा जूते में सिक्का डालने से तुम्हे कम ख़ुशी मिली ?” शिष्य बोला , “ आपने आज मुझे जो पाठ पढाया है , उसे मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा . आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था कि लेने की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है . देने का आनंद असीम है!